कलम से - ऑनलाइन कवि सम्मेलन- डॉ.अवधेश तिवारी "भावुक"  की कविता उन्ही की जुबानी

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0 0 hace 4 meses
दी और जल

तुम हो कल-कल करती नदिया,मैं हूँ तुझमें बहता जल,
तेरे मन के आश्रय से ही , उन्नत होगा मेरा कल।

तुम हो चञ्चल बहती धारा,
मैं बसता हूँ तेरे अन्तर,
लहरा के बल खाके बहना
मुझको लिए हृदय के अन्दर।

साथ चले हैं सतत चिरन्तन, मिले रुकावट या अरिदल,
तुम हो कल-कल करती नदिया,मैं हूँ तुझमें बहता जल।

डगर तेरी पर्वत घाटी है
पर संग - संग मैं भी चलता हूँ,
ऊबड़ - ... Más informaciones

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